Saturday, September 22, 2012

थोड़ा और चलो....


नितिन आर. उपाध्याय

ये सियाह रात कट जाएगी, थोड़ा और चलो,
आगे सहर भी आएगी, थोड़ा और चलो,


यूं बैठे रहने से कभी फासले कम नहीं होंगे,
मंजिल नजर आएगी, थोड़ा और चलो,


उदासियों के दरख्तों पर बहार भी आएगी,
इश्क की राहों पर थोड़ा और चलो,


किसी के दिल तक पहुंचना आसान नहीं है,
उसकी आंखों की गहराई में थोड़ा और चलो,


अश्कों की बारिश में भिगने लगोगे अभी,
यादों के मौसम में थोड़ा और चलो...

Tuesday, August 28, 2012

कौन कहता आज तुम सुंदर नहीं हो....

कौन कहता आज तुम सुंदर नहीं हो....

किसने कहा चेहरा उतरा सा है,
किसने कहा रंग भी फीका सा है,
कौन कहता हंसी फिकी सी है,
किसने कहा लटें भी उलझी सी हैं,
तुम किसी हाल में कमतर नहीं हो,
कौन कहता आज तुम सुंदर नहीं हो....


खुशियों के पीछे पागल जो है,
वो दुनिया विरह वेदना क्या जानें,
चेहरे पर जिसके बनावट की मुस्कान,
वो प्रेम में सिसकना क्या जानें,
किसी अप्सरा से आज तुम बेहतर कहीं हो,
कौन कहता आज तुम सुंदर नहीं हो.....


देखो विरह ने आज क्या सिंगार किया है,
आंखों को सूर्ख, चेहरे को बुझा सा रंग दिया है,
किस्मत से किसी को प्रेम की ये पीड़ा है मिलती,
किस्मत ने ही तुमको, मुझको ये तोहफा दिया है,
कोई विरहणी नहीं, आज तुम जैसे दुल्हन नई हो,
कौन कहता है आज तुम सुंदर नहीं हो.....

Thursday, February 2, 2012

मेरी जुस्तजू...


मेरी जुस्तजू को कोई समझ सका न कभी,
हर एक को बस आवारगी ही नज़र आई,

मेरी उदास आँखों में झांक कर देखा जो उसने तो,
कुछ अपनी, कुछ ज़माने की खता नज़र आई.....

Friday, January 13, 2012

मृत्यु, तुम अबूझ पहेली हो...

नितिन आर. उपाध्याय

क्रूर, कठिन, कठोर तुम,
जीवन का अंतिम पड़ाव,
सांसों का अंतिम छोर तुम,
भरी सारी दुनिया पर भारी,
एक तुम अकेली हो,
मृत्यु तुम अबूझ पहेली हो...

जीवन क्या? सत्य या सपना,
कभी समझ नहीं कुछ पाएंगे,
कुछ पाया, कुछ रह गया पाना,
इसी उधेड़बुन में दिन गुजर जाएंगे,
इसी सत्य, स्वप्न और असत्य के परे,
खड़ी तुम अविचल अकेली हो,
मृत्यु तुम अबूझ पहेली हो,

जिंदगी पर खड़े हैं प्रश्न कई,
हर दिन एक परिभाषा नई,
जीवन पथ का हर साथी,
एक दिन छोड़ कर जाएगा,
सच है किसका साथ यहां
हर क्षण रह पाएगा,
लेकिन तुम सांसों की संगिनी,
प्राणों की अंतिम सहेली हो,
मृत्यु तुम अबूझ पहेली हो....

जब तक खुश हूं, जीवित हूं मैं,
तुम असत्य ही हो,
जब सत्य पथ से पांव डिगे,
तुम भयंकर स्वप्न सी लगती हो,
जब सपने टूटें, साथी छूटें,
हाथ छिटक कोई जाए,
जीवन के मधु रस से भी,
जब स्वाद कटु सा आए,
उस क्षण तुम अंतिम सत्य हो,
उस क्षण तुम पसंद पहली हो,
मृत्यु तुम अबूझ पहेली हो,


कितने रूप, कितने रंग,
कितने भाव तुम्हारे,
तुम हर पल हर जगह,
शक्तिशाली तुम, समर्थ हर तरह,
क्रूर, कठिन, कठोर तुम,
फिर भी नित्य नवेली हो,
मृत्यु तुम अबूझ पहेली हो.....

Tuesday, July 5, 2011

दिल, दोस्ती और प्यार....


नितिन आर. उपाध्याय
साइकिल हाथ में लिए राजा गली से गुजर रहा था। गली के ठीक बीच में पहुंचते ही उसके कदम ठिठक गए। चलती साइकिल को खड़ा किया और कुछ सुधारने लगा। साइकिल की ओट से सामने वाले घर में झांकने की लगातार कोशिश कर रहा था। बमुश्किल दो मिनट वो बैठा रहा साइकिल की आड़ में फिर पकड़े जाने के डर से उठा और चल दिया।
गली के बीच वाले मकान में रहती थी गौरी जो कभी उसके साथ पढ़ती थी। अब वो गल्र्स स्कूल में थी और राजा पुराने स्कूल में ही रह गया। गौरी की एक झलक देखने के लिए वो रोज तीन चार मोहल्लों को लांघकर इस गली में आता था। कभी-कभी नुक्कड़ की दुकान पर उससे सामना हो जाता और मुस्कुराहटों का आदान-प्रदान होता तो राजा का दिन बन जाता। उस दिन वो हवा में होता था। महीनों गुजर गए। सिलसिला चलता रहा। दोस्तों ने समझाया राजा रोज चक्कर लगाने से कुछ नहीं होगा, एक दिन जाकर बात तो करनी ही पड़ेगी।
दोस्तों के समूह में यह एक बड़ा चिंता का विषय था कि राजा के प्रेम रोग का इलाज कैसे किया जाए। सभी इस गहन चिंता में थे। महेश नामक एक मित्र ने गौरी की किसी सहेली मीना से दोस्ती कर ली। अब राजा की जिंदगी में गौरी के बाद सबसे ज्यादा कोई महत्वपूर्ण था तो वो था महेश। महेश ने उसे काफी हिम्मत बंधाई, मीना के जरिए गौरी तक पहुंचेंगे। राजा के सपनों को तो मानो पंख लग गए। अब गौरी की गली में चक्कर काटना छोड़ दिया। अब सुबह से महेश के घर के चक्कर लगने लगे।
महेश और मीना की दोस्ती भी रंग ले रही थी। महेश के लिए राजा की दोस्ती अब वैसी नहीं थी, राजा के लिए महेश महत्वपूर्ण का और महेश के लिए मीना। राजा, महेश की खुशामद में लगा रहता। जो पैसे उसने इस उम्मीद में बचाए थे कि गौरी से जब दोस्ती होगी तो उसे तोहफे देने में काम आएंगे, वो महेश को मनाने में ही खर्च हो गए।
महेश ने अंतत: भरोसा दिलाया।
"चिंता मत कर मैं मीना से कल ही बात करता हूं, वो तेरे लिए गौरी से बात करेगी।"
राजा आसमान में उडऩे लगा। दिन कटने का इंतजार, कभी मंदिर में जाता, कभी सोने की कोशिश करता लेकिन हर प्रयास में असफल।
जैसे-तैसे रात कटी, सूरज निकला। राजा फटाफट तैयार होकर स्कूल के लिए भागा। स्कूल से लौटा, बेग पटका और सीधे महेश के घर।
महेश घर की छत पर अकेला खड़ा था। राजा सीधे गलियारे से होते हुए सीढिय़ों को लांघते हुए तेजी से उसके पास पहुंचा।
उसके सारे सवाल चेहरे पर ही दिख रहे थे। वो कुछ बोलता इससे पहले ही महेश बोल पड़ा।
"तू मेरा साथ छोड़ दे, मुझे अब नहीं रहना तेरे साथ। "
"क्यों"
"क्यों से क्या मतलब? तेरे चक्कर में आज मेरा और मीना का झगड़ा हो गया। मीना ने कहा है वो गौरी से कोई बात नहीं करेगी। मैं उस पर इसके लिए ज्यादा जोर दूंगा तो वो मेरी दोस्ती भी छोड़ देगी। तू अपनी बात खुद कर ले। और अभी तू जा, मीना आने वाली है उसने तूझे देखा तो ज्यादा गुस्सा होगी। "
राजा धम्म से जमीन पर आ गया। भारी मन से सीढिय़ों से उतरा, घर की ओर चल दिया।
घर पहुंचते ही उसने साइकिल उठाई, फिर उस तंग गली में पहुंच गया और बीच वाले मकान के सामने जाते ही उसकी साइकिल फिर रुक गई। साइकिल की आड़ से फिर गौरी के घर में झांकने लगा।

Tuesday, June 28, 2011

अपराधी....


नितिन आर. उपाध्याय
रात का तीसरा पहर बीत रहा था, उसकी आंखों में अभी भी नींद नहीं थी। बस हर करवट के साथ कुछ पल बीत जाते। मन बेचैन था, आंखें दीवारों पर बीते सालों की कुछ तस्वीरें देखने की कोशिश कर रही थीं। कुछ धुंधली तस्वीरें उभर भी आईं।
आठ साल पहले.....मां का लाडला जतिन जैसे ही कॉलेज में पहुंचा बड़ा आदमी बनने का भूत सिर पर सवार हो गया। पिताजी कपड़े की दुकान चलाते थे, बहन स्कूल में थी। पिताजी समझाते रहते, सपनों की दुनिया से बाहर आ, अब जवान हो रहा है, जिम्मेदारियां संभालना सीख। लेकिन जतिन के दिमाग में तो कोई बड़ा आदमी बनने का खुमार छाया हुआ था, जिसके पीछे दुनिया दौड़े। मां ने हमेशा जतिन का ही पक्ष लिया, मां के कवच के आगे पिता के ताने और डांट दोनों ही बेकार जाते थे।
एक दिन दुकान के गल्ले से पैसे निकालकर जतिन ने लॉटरी खरीद ली। हार गया, सारे पैसे गवां दिए। पिताजी को पता चला तो उनका पारा चढ़ गया। कमाना तो दूर अब पैसे उड़ाने पर उतर आया है। जतिन के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया। युवा खून ने उबाल मारा और वह घर छोड़कर मुंबई आ गया। मां रोती रही लेकिन जतिन नहीं माना। पिताजी का गुस्सा ठंडा हुआ तो जतिन की तलाश शुरू हुई लेकिन तब तक वो बहुत दूर निकल चुका था।
सालों बाद कल अचानक जतिन को अपने शहर का एक पुराना दोस्त मुंबई में मिल गया। उसने बताया कि  जतिन तुम्हारे घर छोडऩे के सदमे में मां बीमार हो गईं। जिंदगी के आखिरी साल अस्पताल के बिस्तर पर गुजरे। कोई तीन साल पहले मां दुनिया को छोड़ गई। पिताजी लगभग अपाहिज हो चुके हैं, दुकान महीनों से बंद पड़ी है। बहन छोटी-मोटी नौकरी करके पिता को जिंदा रखे हुए है।
अभी तक सफलता के आसमान में उड़ रहा जतिन अब जमीन पर था। छोटी बहन जिसकी अभी तक शादी हो जानी थी, वो नौकरी कर पिता को पाल रही है। वो अपनी ही नजरों में गिर गया। जिस मां ने हमेशा उसे बचाया वो उसके सदमे में गुजर गई। आज जतिन अपराधी था। एक सफल नौकरीपेशा से एक ही दिन में अपराधी बन गया। सफलता का सारा नशा काफूर हो गया।
अब सुबह हो रही थी। लेकिन जतिन के आगे अंधेरा घना होता जा रहा था। किस मुंह से जाए अपने घर, क्या पिताजी माफ कर देंगे, बहन क्या कहेगी, लोग कैसी बातें करेंगे? जतिन को कई सवालों ने घेर लिया। आइने में खुद से निगाहें मिलाते भी उसे डर लग रहा था। जैसे-जैसे शहर के रास्तों का शोर बढ़ रहा था, जतिन ज्यादा बेचैन हो रहा था। वो उठा, कुर्सी पीछे सरका कर बैठा, टेबल पर रखा एक लेटर पेड उठाया और लिखने लगा। पहले अपने घर का पता लिखा, पिताजी का नाम और फिर अपनी बहन रश्मि का नाम।
प्यारी बहन, 
मुझे माफ कर देना, जो जिम्मेदारी मुझे उठानी थी वो तुम्हें उठानी पड़ रही हैं। पिताजी का अपराधी तो मैं हमेशा से ही था, आज तुम्हारा भी हूं और मां का भी। आज मेरे पास जो भी है वो सब अब तुम्हारा है। इससे तुम्हारा बचपन तो नहीं लौट सकता लेकिन तुम्हें कुछ मदद जरूर मिलेगी। पिताजी जब भी डांटते थे, मां ही मुझे बचाती थी। आज भी मैं बहुत डरा हुआ हूं, पिताजी से और तुमसे नजरें नहीं मिला पाऊंगा। शायद मां ही मुझे बचाएगी, इसलिए मैं उसी के पास जा रहा हूं। हो सके तो मुझे माफ कर देना।
तुम्हारा भाई जतिन

Friday, June 24, 2011

ये बारिश भी अजीब है....



नितिन आर. उपाध्याय
बादल घुमड़ रहे थे, सड़कों पर एकाएक बड़ी-बड़ी बूंदें गिरने लगीं। रूपाली साड़ी का पल्लू सिर पर रखे, तेज कदमों से घर की ओर दौड़ी। तभी रास्ते में दो जानी पहचानी आंखों ने उसकी नजरों को थाम लिया। बारिश तेज होती जा रही थी और उसके कदम धीमें। धीरे से दरवाजा खोलकर घर के भीतर आ गई। बाहर की बारिश बाहर ही रह गई। लेकिन उन आंखों का गिलापन उसे याद आ रहा था। रूपाली की आंखों के आगे सारे दृश्य दौड़ रहे थे। एक बारिश बाहर हो रही थी, दूसरी रूपाली की आंखों से। 
कोई छह महीने पहले कि ही तो बात है जब रूपाली और माधव के प्यार को घर वालों की रजामंदी मिल गई थी। दोनों ही बहुत खुश थे। माधव मध्यमवर्गीय परिवार का लड़का था और रूपाली एक पोस्टमास्टर की लड़की। दोनों की ही आर्थिक स्थिति सामान्य दर्जे की थी। शादी की तैयारियां शुरू हो गईं। तभी एक रात रूपाली के पिता को हार्ट अटैक आ गया। तैयारियां धरी रह गईं। शादी के लिए संभाला हुआ पैसा इलाज में खर्च हो गया। डॉक्टर कहते हैं बायपास सर्जरी करनी होगी। बहुत पैसा खर्च होगा। कोई मददगार नहीं था। माधव की भी हैसीयत इतनी नहीं थी।
 समाज का नियम होता है, जब कोई अमीर मुसीबत में पड़ता है तो लोग बिना शर्त उसकी मदद करते हैं, इसे व्यवसायिक भाषा में इंवेस्टमेंट कहते हैं लेकिन गरीब के साथ हाथोंहाथ सौदे बाजी होती है। आगे का क्या भरोसा कुछ बचे,  न बचे। दूर के एक रिश्तेदार मदद के लिए आगे आए। जो उसी तरह का एक सौदा था। रूपाली को अपने एक विकलांग बेटे के लिए मांग लिया। शादी का सारा खर्च और पिताजी के इलाज का भी पूरा वादा किया। प्यार से कुछ हासिल नहीं होता लेकिन इस सौदे में पिता की जान बच रही थी। रूपाली ने कुर्बानी का रास्ता चुना। दो महीने पहले शादी हुई। ससुराल वालों ने वादा निभाया और रूपाली के पिता का ऑपरेशन करवाया। आज ऑपरेशन है। मुंबई के एक बड़े अस्पताल में।
 कुर्सी पर बैठी रूपाली आज माधव को देखकर दु:खी थी। उसे दो साल के रिश्ते में गुजरा एक-एक पल याद आ रहा था। हर याद के साथ आंखों से आंसुओं की झड़ी भी। धीरे-धीरे यादों का सावन गुजर गया, आंसू थम गए। वो उठी और काम-काज में लग गई। काम करते-करते फिर कब समय गुजर गया, पता नहीं चला। टेलीफोन की एक घंटी ने उसका ध्यान बंटाया। घर के सन्नाटे को तोड़ती घंटी की आवाज ने माहौल फिर बदल दिया। 
हैलो...
हैलो रूपा...रूपाली के बड़े भाई की आवाज थी। 
रूपा, बाबूजी का ऑपरेशन हो गया, सब ठीक है, डॉक्टर कह रहे हैं अब खतरा नहीं है। बाबूजी ठीक हो गए रूपा...। 
भाई उधर से बोल रहा था लेकिन रूपाली के मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे। बस फिर एक बारिश शुरू हो गई। आंखों से खुशियों की बारिश। उसने आज पहली बार बारिश के मौसम को इतने नजदीक से महसूस किया था।